SC का यह फैसला घर खरीदारों के लिए बड़ी उम्मीद
नई दिल्ली। देश में कई बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट्स बिल्डर्स की मनमानी और दिवालिया होने के चलते लटक गए। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट और NCLT के निर्देश पर ये हाउसिंग प्रोजेक्ट्स, अन्य बिल्डर्स को सौंपे गए। लेकिन, पहली बार ऐसा हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला घर खरीदारों पर छोड़ा है कि वह तय करें कि अब किस बिल्डर से उन्हें अधूरे प्रोजेक्ट्स का काम पूरा कराना है।
यह दिलचस्प मामला इंदौर में 'पुष्प रत्न रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड' से जुड़ा है, जहां दो बिल्डर्स ने मिलकर, घर खरीदारों से एडवांस लिया और 10 साल से ज्यादा का वक्त होने के बावजूद घर नहीं सौंपे। इस रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में 77 से ज़्यादा लोगों को घर बेचे गए थे। लेकिन ये दोनों प्रमोटर आपस में झगड़ते रहे, इस वजह से हाउसिंग प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं हुआ।
जब NCLT पहुंचे होम बायर्स
सालों तक परेशान होने के बाद घर खरीदार IBC कानून के तहत बिल्डर को दिवालिया घोषित करने के लिए NCLT पहुंच गए, जहां उनकी जीत हुई क्योंकि एनसीएलटी ने बिल्डर के खिलाफ दिवालियापन की कार्यवाही शुरू करने को मंजूरी दे दी। इस आदेश को कॉरपोरेट देनदार (बिल्डर)- अग्निहोत्री और जैन ग्रुप ने चुनौती दी, जिसे एनसीएलटी ने नहीं माना। इसके बाद ये बिल्डर सुप्रीम कोर्ट गए, जहां भी सर्वोच्च अदालत ने घर खरीदारों के पक्ष में फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट में बिल्डर की ओर से घर खरीदारों को 6 करोड़ की रकम ब्याज के साथ लौटाने की बात कही गई, लेकिन होम बायर्स ने इसे नामंजूर करते हुए घर देने की मांग की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्रेडिटर्स कमेटी पर यह फैसला घर खरीदारों पर छोड़ दिया है कि वह इस अधूरे प्रोजेक्ट्स को किस नए बिल्डर के द्वारा बनवाना चाहते हैं। खास बात है कि इस कमेटी में 78 फीसदी वोट घर खरीदारों का है, ऐसे में अब वे जिस बिल्डर से चाहें घर बनवा सकते हैं। वहीं 3 बिल्डर इस अधूरे प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए सहमति दिखा चुके हैं।
'बायर्स की बड़ी ताकत IBC कानून'
इस मामले में घर खरीदारों का प्रतिनिधित्व करने वाले NSA लीगल के पार्टनर एडवोकेट निपुण सिंघवी ने कहा, "यह आदेश डिफॉल्ट करने वाले डेवलपर्स को संदेश है कि खरीदार का धैर्य अनंत नहीं है। पीड़ित गृहस्वामियों के लिए त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए IBC कानून एक शक्तिशाली साधन बना हुआ है।"
इस मामले में होम बायर्स ने एक बड़ी मिसाल कायम की है। क्योंकि, आमतौर पर बिल्डर के खिलाफ दिवालियापन की कार्रवाई, बैंक जैसे बड़े लेनदार करते हैं। इसके अलावा, होम बायर्स भी ऐसा कर सकते हैं, आमतौर पर यह कम देखने को मिला है।
न्यायालय ने माना कि कॉरपोरेट देनदार के प्रमोटर्स के पास मामले को सही ढंग से सुलझाने का पर्याप्त अवसर था, लेकिन इसके बजाय वे आपस में झगड़ते रहे, जिससे घर खरीदारों को न्याय मिलने में देरी हुई।
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