पश्चिम बंगाल चुनाव में SIR बना सबसे बड़ा सियासी मुद्दा
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है, लेकिन इस बार चर्चा विकास या रोजगार से कहीं अधिक मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) पर केंद्रित है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची में हुआ यह बड़ा बदलाव चुनावी नतीजों को पूरी तरह पलट सकता है।
SIR का गणित: क्यों मचा है घमासान?
चुनाव आयोग द्वारा की गई इस प्रक्रिया के तहत बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख नाम हटाए गए हैं। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का करीब 12% है।
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मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना: इन मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे ज्यादा नाम काटे गए हैं।
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मटुआ समुदाय: नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में मटुआ समुदाय के मतदाताओं के नाम हटने से जमीनी स्तर पर काफी आक्रोश है।
सियासी वार-पलटवार
इस मुद्दे ने टीएमसी और भाजपा के बीच वैचारिक और राजनीतिक युद्ध को और तेज कर दिया है:
1. ममता बनर्जी का आक्रामक रुख: मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे "लोकतंत्र पर हमला" करार दिया है। टीएमसी का नया नारा “जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला” इसी प्रतिरोध का प्रतीक बना हुआ है। पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार SIR के बहाने एनआरसी (NRC) का पिछला दरवाजा खोल रही है।
2. भाजपा का तर्क: वहीं, भाजपा इस कदम का समर्थन करते हुए इसे 'पारदर्शी चुनाव' की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। पार्टी का दावा है कि इस प्रक्रिया से अवैध घुसपैठियों के नाम सूची से बाहर हुए हैं, जिससे केवल वास्तविक नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार मिलेगा।
मटुआ और अल्पसंख्यक वोट: किसका बिगड़ेगा खेल?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह मुद्दा दोनों ही बड़ी पार्टियों के लिए "दोधारी तलवार" साबित हो सकता है:
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भाजपा को डर: मटुआ समुदाय भाजपा का मजबूत वोट बैंक रहा है। यदि उनके नाम बड़ी संख्या में हटे हैं, तो इसका सीधा नुकसान भाजपा को 40 से अधिक सीटों पर हो सकता है।
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टीएमसी को बढ़त: टीएमसी इस मुद्दे को 'बंगाली अस्मिता' और 'अधिकारों की रक्षा' से जोड़कर सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रही है।
विशेषज्ञ की राय: "इस बार बंगाल का चुनाव केवल नीतियों पर नहीं, बल्कि 'पहचान' और 'मतदान के अधिकार' पर लड़ा जा रहा है। SIR से उपजा असंतोष दूसरे चरण के मतदान में निर्णायक भूमिका निभाएगा।"
अगला पड़ाव
दूसरे चरण का मतदान अगले बुधवार (29 अप्रैल) को होना है। क्या हटाए गए नामों का गुस्सा बूथों पर नजर आएगा या प्रशासन की यह 'सफाई' नई सरकार का मार्ग प्रशस्त करेगी? इसका फैसला 4 मई को होगा।
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