वैकल्पिक नहीं, आवश्यकता! प्राकृतिक खेती से बदलेगी भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था
अहमदाबाद: विकसित कृषि संकल्प अभियान के अंतर्गत बुधवार को हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के झंडुता में प्राकृतिक खेती पर क्षेत्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से सेहत भी और समृद्धि भी है। प्राकृतिक खेती वैकल्पिक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि यह भारत के कृषक समुदाय की समृद्धि, समाज के स्वास्थ्य, पर्यावरण की रक्षा और टिकाऊ विकास की नींव है।
उन्होंने हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती की दिशा में हो रहे व्यापक कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि हिमाचल की जलवायु, मृदा संरचना और सीमित कृषि भूमि इस पद्धति के लिए अत्यंत उपयुक्त है। राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक खेती से न केवल भूमि की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि इससे तैयार होने वाले अनाज और सब्जियां उच्च गुणवत्ता की होती हैं। किसानों की आय में वृद्धि होती है और रासायनिक खेती से होने वाले दुष्प्रभाव से बचाव होता है।
2.15 लाख किसान कर रहे रसायन मुक्त खेती
राज्यपाल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जनता और किसान प्राकृतिक खेती को अपनाकर न केवल अपनी आय और सेहत को सुधार रहे हैं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र को एक नई दिशा भी दे रहे हैं। आचार्य देवव्रत हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल थे, उस समय हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से 2018 में प्राकृतिक खेती-खुशहाल किसान योजना की शुरुआत 25 करोड़ रुपए के बजट से की गई थी। आज इस योजना के अंतर्गत 3584 ग्राम पंचायतों में 2.15 लाख से अधिक किसान लगभग 38 हजार हेक्टेयर भूमि पर रसायन मुक्त खेती कर रहे हैं। संगोष्ठी में हिमाचल प्रदेश के तकनीकी शिक्षा एवं नगर नियोजन मंत्री राजेश धर्माणी, पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर, विधायक आदि मौजूद थे।
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