TCS केस की आरोपी निदा खान को मिली जमानत, कोर्ट ने गर्भावस्था को माना अहम आधार
नासिक:महाराष्ट्र के कानूनी गलियारों से एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक न्यायिक फैसला सामने आया है, जहां जिला एवं सत्र न्यायालय ने एक हाई-प्रोफाइल मामले की आरोपी महिला को मानवीय आधार पर बड़ी राहत दी है. दिग्गज आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की पूर्व एसोसिएट के खिलाफ दर्ज मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने कानून की मर्यादा के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखा. इस अदालती फैसले ने न केवल न्यायिक विवेक की एक नई मिसाल पेश की है, बल्कि देश की कानूनी व्यवस्था में मातृत्व और नवजात के अधिकारों को लेकर एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है.
मातृत्व की गरिमा और पौराणिक संदर्भों के आधार पर मिली बड़ी राहत
गंभीर आरोपों का सामना कर रही पांच महीने की गर्भवती पूर्व महिला कर्मचारी को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने ७५ हजार रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के सक्षम जमानतदार की शर्तों पर रिहा करने का निर्देश दिया. अदालत ने जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए बेहद गंभीर और दार्शनिक टिप्पणी की कि किसी भी महिला के लिए बंदी गृह की सलाखों के पीछे संतान को जन्म देना अत्यंत पीड़ादायक और सामाजिक रूप से कलंकित करने वाला होता है. न्यायाधीश ने इस विकट परिस्थिति की तुलना करने के लिए द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के कारागार में हुए जन्म के ऐतिहासिक प्रसंग का भी उल्लेख किया और स्पष्ट किया कि एक अजन्मे शिशु के उज्जवल भविष्य और हितों की रक्षा के लिए अदालत अपने विशेषाधिकारों का उपयोग कर आरोपी को यह सशर्त राहत प्रदान कर रही है.
गिरफ्तारी के बाद चली लंबी कानूनी जद्दोजहद और दोनों पक्षों की दलीलें
धर्मांतरण और उत्पीड़न जैसे संगीन मामलों में नामजद होने के बाद आरोपी महिला काफी समय तक पुलिस की पकड़ से दूर रही थी, जिसे बाद में जांच दल ने छत्रपति संभाजीनगर के एक परिसर से ढूंढ निकाला था. अदालत के समक्ष चली लंबी बहस में आरोपी के कानूनी सलाहकार ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल पूरी तरह बेकसूर है और कॉरपोरेट विवाद के चलते उसे इस साजिश में घसीटा गया है, साथ ही मामले की शुरुआती जांच और चार्जशीट की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है. इसके विपरीत, अभियोजन पक्ष और सरकारी वकीलों ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि जांच के दौरान आरोपी के खिलाफ पीड़ित महिलाओं पर वैचारिक दबाव बनाने और प्रताड़ित करने के पर्याप्त डिजिटल व मौखिक साक्ष्य मिले हैं, इसलिए उसे जेल में ही रखा जाना चाहिए.
आईटी कंपनी के भीतर कथित शोषण और अनुसूचित जाति एक्ट के तहत जांच तेज
देवलाली कैंप पुलिस प्रशासन इस समय टीसीएस की स्थानीय इकाई में काम करने वाली महिला कर्मियों के साथ हुए दुर्व्यवहार, जबरन वैचारिक परिवर्तन के प्रयासों, छेड़छाड़ और मानसिक प्रताड़ना से जुड़े कुल नौ अलग-अलग संवेदनशील मुकदमों की गहराई से तफ्तीश कर रहा है. इस पूरे मामले को इसलिए भी बेहद गंभीर माना जा रहा है क्योंकि मुख्य शिकायतकर्ता महिला समाज के अनुसूचित जाति वर्ग से संबंध रखती है, जिसके कारण पुलिस ने इस केस में सामान्य धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी एससी-एसटी एक्ट की कड़ी धाराएं भी जोड़ी हैं.
धार्मिक दबाव और बुर्का पहनाने के आरोपों की सच्चाई अब अदालत तय करेगी
जांच एजेंसियों द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत की गई शुरुआती केस डायरी के मुताबिक, आरोपी महिला पर यह गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि उसने कंपनी की कनिष्ठ सहकर्मियों को जबरन एक विशेष संप्रदाय के धार्मिक ग्रंथ और पोशाकें उपलब्ध कराई थीं. इसके अलावा शिकायत में यह भी कहा गया है कि पीड़िता के स्मार्टफोन में जबरन कुछ विशेष प्रकार के एप्लीकेशन डाउनलोड करवाए गए और उसे घर पर जाकर एक विशिष्ट पद्धति से उपासना करने व हिजाब पहनने के लिए मानसिक रूप से बाध्य किया गया. हालांकि, इन सभी आरोपों की जमीनी हकीकत और साक्ष्यों की प्रमाणिकता का अंतिम फैसला आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की गवाहियों और अदालत की अंतिम सुनवाई के बाद ही साफ हो सकेगा.
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