नेपाल का विरोध, कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर विवाद
नई दिल्ली/काठमांडू: भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा को दोबारा शुरू करने के लिए जो समझौता हुआ है, उस पर पड़ोसी देश नेपाल ने एक बार फिर अपना विरोध दर्ज कराया है। नेपाल ने लिपुलेख और कालापानी के इलाकों पर अपना पुराना दावा दोहराते हुए कहा है कि इस यात्रा मार्ग से जुड़े किसी भी फैसले में उसकी भागीदारी भी जरूरी होनी चाहिए। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने अपने भारत दौरे के समय पत्रकारों से बात करते हुए साफ किया कि इन विवादित क्षेत्रों को लेकर नेपाल की आपत्तियां बेहद स्पष्ट हैं।
नेपाल की सहमति के बिना फैसला मंजूर नहीं
नेपाल के विदेश मंत्री का कहना है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जिन रास्तों का इस्तेमाल होता है, उनमें से कुछ मार्ग सीधे तौर पर नेपाल की सीमाओं से जुड़े हुए हैं। उन्होंने विशेष रूप से कालापानी और लिपुलेख इलाकों का नाम लेते हुए कहा कि नेपाल सालों से इन जगहों को अपना हिस्सा मानता रहा है। नेपाल के मुताबिक, उसकी सहमति और बातचीत के बिना भारत और चीन को आपस में ऐसा कोई समझौता नहीं करना चाहिए था। नेपाल ने अपनी इस चिंता और विरोध से भारत और चीन, दोनों ही देशों को आधिकारिक तौर पर अवगत करा दिया है।
जून से अगस्त के बीच होनी है पवित्र यात्रा
कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील तिब्बत के क्षेत्र में स्थित हैं, जो हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म के करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक बेहद पवित्र केंद्र हैं। भारत और चीन के बीच आपसी रिश्तों को बेहतर करने की कोशिशों के तहत करीब पांच साल के लंबे इंतजार के बाद इस यात्रा को दोबारा शुरू किया गया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने घोषणा की थी कि इस साल जून से अगस्त के बीच यह यात्रा आयोजित की जाएगी, जिसके लिए उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथू ला दर्रे को मुख्य रास्तों के तौर पर चुना गया है।
समझिए क्या है पूरा सीमा विवाद
भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के क्षेत्रों को लेकर काफी पुराना सीमा विवाद है। नेपाल का तर्क है कि साल 1816 में हुई 'सुगौली संधि' के मुताबिक ये सभी इलाके उसकी सीमा के अंदर आते हैं। इसी दावे के आधार पर साल 2020 में नेपाल ने अपना एक नया राजनीतिक नक्शा भी जारी किया था, जिसमें उसने इन तीनों क्षेत्रों को नेपाल के भूभाग में दिखाया था।
भारत का रुख पूरी तरह साफ
दूसरी तरफ, भारत ने नेपाल के इन दावों को हमेशा की तरह पूरी तरह से खारिज कर दिया है। भारत का रुख साफ है कि लिपुलेख उत्तराखंड का एक अभिन्न हिस्सा है और इस पूरे क्षेत्र पर बहुत लंबे समय से भारत का ही प्रशासनिक नियंत्रण रहा है। भारतीय पक्ष ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि लिपुलेख दर्रा आज का नहीं, बल्कि 1950 के दशक से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक पारंपरिक और ऐतिहासिक मार्ग रहा है।
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