"जल संकट का शिकार बना मुरैना का आदिवासी इलाका; 45 डिग्री पारे के बीच गंदा पानी पीने को मजबूर, गांवों में पसरी बीमारियां"
मुरैना | मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक तरफ जहां प्रशासन 'हर घर जल' योजना के तहत शत-प्रतिशत पानी पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जिले के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में आज भी लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। बरखेड़ा ग्राम पंचायत के बहेरी सहित आसपास के पांच गांवों में जल संकट इस कदर गहरा गया है कि महिलाएं और बच्चे 45 डिग्री की चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर पानी लाने को विवश हैं।
दूषित पानी से बीमारियों का प्रकोप और असमय मौतें
स्थानीय निवासियों का कहना है कि स्वतंत्रता के इतने साल बीत जाने के बाद भी उनके गांवों में पीने के पानी की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं की जा सकी। गर्मी के मौसम में तो लोग जैसे-तैसे दूर-दराज के कुओं से पानी ले आते हैं, लेकिन मानसून की शुरुआत होते ही रास्ते कीचड़ से भर जाते हैं। ऐसी स्थिति में पूरा गांव गड्ढों और नालों में जमा गंदा और दूषित पानी पीने पर मजबूर हो जाता है। ग्रामीणों ने दर्द बयां करते हुए बताया कि हर साल बारिश के दिनों में जलजनित बीमारियां महामारी का रूप ले लेती हैं, जिसके कारण अब तक कई ग्रामीण अपनी जान गंवा चुके हैं।
दशकों बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित आदिवासी समाज
मुरैना और श्योपुर जिले की सीमा पर बसे इस बहेरी गांव में लगभग 200 आदिवासी परिवार जीवन-यापन करते हैं। भौगोलिक रूप से सीमा पर होने के कारण यह इलाका विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है और आजादी के दशकों बाद भी यहां शुद्ध पेयजल की एक बूंद नहीं पहुंच सकी है। अपनी प्यास बुझाने के लिए इन आदिवासियों को श्योपुर जिले की विजयपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले बीटा गांव के जंगलों में स्थित कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है।
25 सालों से नहीं बदले हालात, ग्रामीणों ने लगाई गुहार
गांव की एक बुजुर्ग महिला दख्खो बाई ने बताया कि जब वह 25 वर्ष पूर्व इस गांव में ब्याह कर आई थीं, तब भी पानी की यही विकट समस्या थी और आज भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। उन्होंने कहा कि उनकी पूरी जिंदगी सिर पर घड़े रखकर पानी ढोने में ही बीत गई, लेकिन प्रशासन ने कभी उनकी सुध नहीं ली। ग्रामीणों ने अब जिला प्रशासन से गांव में तुरंत हैंडपंप लगवाने और नल-जल योजना शुरू करने की पुरजोर मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि बारिश शुरू होने से पहले कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो एक बार फिर हजारों लोगों को दूषित पानी पीने के नरक को झेलना पड़ेगा।
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