उदयपुर के 90 बच्चे गुजरात में फंसे, महीने के सिर्फ 5 हजार रुपए में काम कर रहे थे
गुजरात। गुजरात के सूरत स्थित कपड़ा फैक्ट्रियों में राजस्थान के उदयपुर जिले से तस्करी कर लाए गए 90 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया है। यह बड़ी कार्रवाई मानव तस्करी विरोधी इकाई (AHTU), बचपन बचाओ आंदोलन और स्थानीय पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत की गई। पकड़े गए सभी बच्चे उदयपुर के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के रहने वाले हैं, जिन्हें बेहतर जीवन का झांसा देकर यहां लाया गया था।
साड़ी फिनिशिंग और मशीनों पर कराया जा रहा था काम
रेस्क्यू किए गए बच्चों की उम्र महज 10 से 15 वर्ष के बीच है। इन बच्चों को सूरत की उन तंग गलियों और फैक्ट्रियों में रखा गया था, जहां साड़ी बनाने, उन पर फिनिशिंग करने और भारी मशीनें चलाने का काम होता है।
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बच्चों को प्रतिदिन 12 से 14 घंटे तक लगातार काम करना पड़ता था।
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फैक्ट्रियों में रोशनी और हवा की उचित व्यवस्था नहीं थी, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा था।
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कई बच्चों के हाथों में मशीनों और रसायनों के कारण गहरे जख्म भी पाए गए हैं।
महीने के मात्र 5 हजार और बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति
पूछताछ में सामने आया है कि इन बच्चों को केवल 5,000 रुपये प्रति माह के वेतन पर रखा गया था, लेकिन वह पैसा भी सीधे उनके माता-पिता या बिचौलियों के पास पहुंचता था।
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बच्चों को डरा-धमकार रखा जाता था ताकि वे भागने की कोशिश न करें।
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उनके खाने-पीने और रहने की स्थिति किसी जेल से कम नहीं थी; उन्हें एक ही छोटे कमरे में दर्जनों की संख्या में सुलाया जाता था।
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दलालों ने उनके माता-पिता को एडवांस पैसे देकर एक तरह से उन्हें बंधुआ बना लिया था।
दलालों के चंगुल से रेस्क्यू और घर वापसी की तैयारी
बाल कल्याण समिति (CWC) ने सभी बच्चों को अपनी कस्टडी में ले लिया है और उन्हें वर्तमान में शेल्टर होम में रखा गया है।
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पुलिस ने इस मामले में फैक्ट्री मालिकों और उन बिचौलियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है जो उदयपुर के गांवों से बच्चों को सप्लाई करते थे।
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बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है ताकि उन्हें इस सदमे से बाहर निकाला जा सके।
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प्रशासन अब इन बच्चों को उदयपुर वापस भेजने और उनके पुनर्वास (Rehabilitation) के लिए राजस्थान सरकार के साथ समन्वय कर रहा है।
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इस घटना ने एक बार फिर आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय मानव तस्करी नेटवर्क की पोल खोल दी है।
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