डायल-100 केस में महिला कर्मचारी से अभद्रता पर हाई कोर्ट सख्त
भोपाल| के डायल-100 कंट्रोल रूम में तैनात एक पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा महिला कर्मचारी के साथ अनुचित व्यवहार के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है. चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने इंस्पेक्टर राजेश कुमार त्रिपाठी की सेवा में वापसी पर रोक लगा दी है. साथ ही, उस सिंगल बेंच के आदेश को भी स्थगित कर दिया गया है, जिसमें उनकी बहाली के निर्देश दिए गए थे. अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल 2026 को होगी|
डायल-100 कंट्रोल रूम का मामला
यह मामला 30-31 अगस्त 2025 की रात का है, जब भोपाल स्थित डायल-100 कंट्रोल रूम में शिफ्ट सुपरवाइजर के रूप में पदस्थ इंस्पेक्टर ने शराब की जांच के नाम पर एक आउटसोर्स महिला कॉल ऑपरेटर को डिस्पैच हॉल के गेट पर खड़ा कर दिया. इसके बाद उन्होंने वहां मौजूद पुरुष पुलिसकर्मियों से महिला के मुंह पर फूंक मारने को कहा, ताकि शराब पीने की पुष्टि की जा सके. यह पूरी घटना CCTV कैमरे में रिकॉर्ड हो गई थी|
CCTV फुटेज के बाद कार्रवाई
महिला कर्मचारी ने अपनी नौकरी की प्रकृति को देखते हुए औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई, लेकिन जब यह फुटेज वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची तो इसे गंभीर और शर्मनाक मानते हुए कार्रवाई की गई. इंस्पेक्टर के पुराने सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत बिना विभागीय जांच के ही उन्हें बर्खास्त कर दिया गया|
हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी को किया निरस्त
सिंगल बेंच का फैसला और सरकार की अपील बाद में हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 19 फरवरी 2026 को यह कहते हुए बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया कि आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया. इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच में अपील की और कोर्ट के सामने CCTV फुटेज पेश करते हुए दलील दी कि मामले की संवेदनशीलता और महिला कर्मचारियों के भय के कारण विभागीय जांच कराना संभव नहीं था|
महिला के साथ ऐसा व्यवहार गरिमा के खिलाफ – हाई कोट
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने स्पष्ट टिप्पणी की कि कोविड के बाद किसी के चेहरे पर फूंक मारना न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि महिला के साथ ऐसा व्यवहार उसकी गरिमा के खिलाफ है. अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की जांच प्रक्रिया पूरी तरह अनुचित है और इसे किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता|
महिलाओं की गरिमा से जुड़ा मामला कोर्ट ने इस पूरे मामले को केवल अनुशासनहीनता तक सीमित न मानते हुए कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा, मानवाधिकार और जांच प्रक्रिया की मर्यादा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया. अदालत ने साफ किया कि किसी भी महिला के साथ अपमानजनक व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में सख्त दृष्टिकोण जरूरी है|
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