बर्फ, भूख, थकावट और बीमारी से मारी गई थी नेपोलियन की सेना: शोध
लंदन । नेपोलियन बोनापार्ट ने अक्टूबर 1812 में जब रूस से अपनी विशाल सेना को पीछे हटने का आदेश दिया, तो उनके लिए यह विनाशकारी साबित हुआ। लगभग तीन लाख सैनिक बर्फ, भूख, थकावट और बीमारियों से जूझते हुए मारे गए। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि कड़ाके की ठंड और भूख ही इस तबाही के प्रमुख कारण थे, लेकिन हाल ही में सामने आई एक नई स्टडी ने इतिहास के इस पन्ने को फिर से खोल दिया है। वैज्ञानिकों ने डीएनए एनालिसिस के जरिए पाया है कि इन सैनिकों की मौत में जूं से फैलने वाले बैक्टीरिया और दूषित भोजन से होने वाली बीमारियों की भी बड़ी भूमिका थी। इस रिसर्च का नेतृत्व इंस्टीट्यूट पाश्चर के माइक्रोबियल पैलियोजेनोमिक्स यूनिट के प्रमुख निकोलस रास्कोवन और उनकी टीम ने किया। उन्होंने लिथुआनिया के विलनियस शहर में मिली एक सामूहिक कब्र से नेपोलियन की ग्रैंड आर्मी के सैनिकों के दांतों का डीएनए परीक्षण किया।
दशकों पहले किए गए अध्ययन में टाइफस और ट्रेंच फीवर जैसी बीमारियों के संकेत मिले थे, लेकिन इस बार इस्तेमाल की गई आधुनिक “शॉटगन सीक्वेंसिंग” तकनीक ने और गहराई से जांच की अनुमति दी। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक उन डीएनए अंशों की पहचान कर सके जो इंसानों में बीमारी पैदा करने वाले 185 तरह के बैक्टीरिया से मेल खाते थे। शोध में पाया गया कि एक सैनिक के दांतों में बोरेलिया रिकरेंटिस नामक बैक्टीरिया के निशान मिले, जो जूं से फैलने वाले “रिलैप्सिंग फीवर” का कारण होता है।
चार अन्य सैनिक साल्मोनेला एंटेरिका बैक्टीरिया के एक प्रकार से संक्रमित पाए गए, जिससे पैराटाइफाइड बुखार होता है। यह बीमारी दूषित पानी या भोजन के सेवन से फैलती है। टीम का मानना है कि इन चार में से एक सैनिक को दोनों बीमारियां एक साथ हो सकती थीं। ये नतीजे उन ऐतिहासिक विवरणों से मेल खाते हैं जिनमें सैनिकों को बुखार, दस्त और कमजोरी जैसी शिकायतों से जूझते हुए बताया गया था। रिसर्चर्स ने बताया कि पिछली स्टडीज में टाइफस या ट्रेंच फीवर पैदा करने वाले बैक्टीरिया के संकेत मिले थे, लेकिन इस बार ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला। उनका मानना है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि या तो सैनिक इन बीमारियों से संक्रमित नहीं थे या फिर संक्रमण बहुत हल्का था, जिसकी डीएनए मौजूदगी अब मिट चुकी है। एक संभावना यह भी है कि इतने वर्षों तक मिट्टी में दफन रहने के कारण डीएनए डिग्रेड हो गया हो या फिर नमूनों में उसकी मात्रा इतनी कम रही हो कि तकनीक उसे पकड़ नहीं सकी।
टीम ने अपने निष्कर्षों की पुष्टि के लिए कई स्टैटिस्टिकल टेस्ट और जेनेटिक एनालिसिस किए। उन्होंने यह भी जांचा कि डीएनए वास्तव में प्राचीन स्रोत से आया है और यह बैक्टीरिया के विकासक्रम में कहां स्थित है। अध्ययन में कहा गया कि इन सैनिकों की मौत का असली कारण सिर्फ ठंड या थकान नहीं था, बल्कि यह कई कारकों का संयुक्त प्रभाव था अत्यधिक ठंड, भूख, पैराटाइफाइड बुखार, रिलैप्सिंग फीवर और जूं से फैली बीमारियों का संगम। हालांकि जूं से होने वाला रिलैप्सिंग फीवर खुद में प्राणघातक नहीं होता, लेकिन पहले से ही कमजोर और भूखे सैनिकों के लिए यह जानलेवा साबित हुआ।
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